रूह

काश कुछ ऐसा हो जाए

ये वक्त चलता रहे,

ये लम्हे चलते रहें,

ये पहर चलता रहे,

बस मेरी उम्र थम जाए।

मैं समेट लूँ सारी यादें,

मैं सहेज लूँ सारे पलों को,

देख लूँ जी भर के

उन आँखों को,

इस दुनिया में जिनसे सबसे पहले रूबरू हुआ।

मैं थाम लूँ उस ऊंगली को

जो कभी मुझे थामे चली थी।

वो खिलखिलाती हँसी

जो कभी मेरे साथ खेली थी।

बस इतनी सी ही तो ख्वाहिश है,

बे-वक्त के इस मुसाफिर की।

छोटी सी राह का जिसका

बस तीसरा हिस्सा है बाकी।।

आकर क़रीब अपनों के और थोड़ा,

कुछ और अच्छा कर जाऊँ।

छोटे से इस सफर के

सुकून भरे पलों को

यादों में पिरो जाऊँ।

या फिर

रहकर दूर उनसे,

ग़म के बवन्डर से बचाने को उनको,

बेरूखी वाला मुखौटा ओढ़ जाऊँ।।

रहगुज़र हूँ तेरा,

कि तूने जो भी दिया

झोली भर के दिया।

रहगुज़र हूँ तेरा,

कि दिये हुए हौसले से तेरे

अपने दम पर कुछ किया।

रहगुज़र हूँ तेरा,

कि कई ख्वाबों को अपने

मैंने हकी़कत में जिया।

रहगुज़र हूँ तेरा,

कि जरा से वक्त में ही

तेरे होने को समझ लिया।

ईबादतग़ार हूँ तेरा

शिकायतग़ार नहीं,

कि अलग बनाकर भी तूने

खास बना दिया।। — रूह

This poem is the best gift i have ever received from someone. someone whom i have grown to adore and respect not only for the fitful exuberance but also for the Indefatigable deftness in distilling soulful and picturesque emotion by the infallible sagacity in choice of words that eloquently succour the baroque and beguiling poems.

Thanks M ,

By the way this only of the poems from M rest assured 100’s more to come…..

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